Wednesday, December 22, 2010

कुछ रिश्ते अनाम होते है...............वही ''आम '' होते है


हां ...कुछ रिश्ते अनाम होते है
जो ना दो नाम तो वही
वही बदनाम होते है
जो लबो से बोल दो
वही ''आम '' होते है

''आँख'' और ''आंसू'' भी एक रिश्ता है
यूँ तो देखो तो पानी है
जो गिरता और रिसता है
पल भर के लिए
गिरा वो आकर पलकों कि कोरो पे
और बन गया कुछ मीठी और खटी यादो में
आकर बस गया दिल कि गहरयियो में

हां ...कुछ रिश्ते अनाम होते है
जो ना दो नाम तो वही
वही बदनाम होते है
जो लबो से बोल दो
वही ''आम '' होते है

सब कुछ लुटा दिया
मगर दिल की राहें
ना आसान हो सकी
ना रुकी मेरी ही आरजूएं
और ना मै ज़िन्दगी को रोक सकी
हर मोड़ पे
मिले नए कारवां
पर ना मिली वफ़ा किसी से

हां ...कुछ रिश्ते अनाम होते है
जो ना दो नाम तो वही
वही बदनाम होते है
जो लबो से बोल दो
वही ''आम '' होते है
..............अंजु..(अनु )

Sunday, September 26, 2010

वीरानियाँ


क्यों उदास है मेरी ये जिन्दगी
खाली खाली सी क्यों लगती है मुझे
गर जिन्दगी रूठ जाये तो
ख़ुशी दूर हो गई मन से

बहुत वीरानियो से गुज़री है ये जिन्दगी
बहारो का अब कोई इंतज़ार भी नहीं है
रास्तो पे चलती भटकती है ये जिन्दगी ......
होगी कोई मंजली इसका भी पता नहीं है

दिल के दरवाज़े खिडकियों को यू किया बंद .......
पर मन की तुफ्फा से झूझती है ये जिन्दगी
आंधियो से कभी डर नहीं लगा हमहे .....
पर खुद के वजूद से ही डरती क्यों है ये जिन्दगी


मान अभिमान में डोलती ये जिन्दगी
अपने ही स्वाभिमान को तोडती ये जिन्दगी

((((((अंजु.....(अनु))))







Friday, September 17, 2010

जिंदगी भर तुम माने नहीं और हम तुम्हे मनाते ही रहे


किताबें बंद हैं यादों की जब सारी मेरे मन में
ये किस्से जेह्‍न से रह-रह कौन पढ़ता है

वो बचपन में कभी जो तितलियाँ पकड़ी थीं बागों में
बरस बीते, न अब तक रंग हाथों से उतरता है

वो खेले थे खेल हम बाग़ में सब के संग
आज हम संग ये कौन आँख मिचौली खेलता है

जिंदगी भर मै चलती रही राह दर राह
पर मंजिल से परे अब कौन है जो धकेलता है

मुस्कुराते रहे दिल लुभाते रहे बात कुछ और थी, तुम छुपाते रहे
दर्द जैसे ग़ज़ल हो कोई मै सदियों से गुनगुनाती रही

धड़क उठा जो ये दिल उनके देखने भर से
कहो तो इसमें भला कहाँ मेरी कोई गलतियां है


तुम्हारी सोच के बिना दुनिया तो हमने देखी ही नहीं
हाँ, मगर एक नई सपनो की दुनिया जरुर बनाते रहे

आज जिंदगी से रूठ जाने की हद हो गयी
जिंदगी भर तुम माने नहीं और हम तुम्हे मनाते ही रहे

((((अंजु ....(अनु)))))

Monday, September 13, 2010

सपने ............


सपने ............

सपने जो सोने नहीं देते
जो किसी को अपना होने नहीं देते
खिड़की पे आया चाँद भी पराया
सा लगता है


मुझे याद है अच्छी तरह से..
हाथो में हाथ था उसका
चार कदम हम भी चले थे मिल के
एक लंबा सफर,
उभरा था इक छोटा सा सपना
मुझे अब तक नहीं मालूम
कि उस दिन
तुम्हारी आँखे
हँसती थी
बोलती थी
या फिर उदास सी थी..
वो उदासी थी या था प्यार तेरा
तेरे जाने के बाद
ढूँढती रहती हूँ
जिस्म से अपने खुशबु तेरी
तुम्हारी आवाज अब भी
लिपटी हुई है चारो और मेरे
झड झड गए वो सारे सपने
आलिंगन सेटूटी नींदे,
क्या जाने अब कितने युगों युगों तक
यू हूँ फिर से सपने सजोने होंगे ??????
(((((अंजु.....(अनु)))))

Tuesday, September 7, 2010

क्या गुनाह है मेरा

क्या गुनाह है मेरा

क्या गुनाह है मेरा
खफा क्यों हो

दिल तोड़ने वाले
सितमगर बेवफा कहलायेगा
गम में रहकर भी
जीने कि कोई किरण
दिखाई नहीं देती है
क्या गुनाह है मेरा
खफा क्यों हो

जो हुए टूटे खिलौने को
फिर से जोड़ दे
यूँ ना मुझे पे तुजुर्बे करो
कुछ भीतर से कुछ बाहर से
मन जल जाएगा यदि अब टूटा तो
क्या गुनाह है मेरा
खफा क्यों हो

प्रेम का अन्य आधार नहीं है
स्मृतियों का शेष पड़ाव नहीं है
ना जाने कल कौन डगर होगी
अगली मंजिल कौन सी होगी
आ जाये मौत कि खबर
और मै पूंछु तुम से कि
क्या गुनाह है मेरा
खफा क्यों हो
(...कृति ....अंजु...(अनु..)

Friday, September 3, 2010

ख्वाब मेरा


उसकी बे पनाह मोहब्बत भरी बातो को समझा हर इशारे में उसकी मोहब्बत की इबादत का रंग नज़र आता है
आ कर वो मेरे कानो में धीमे से एक गीत गुनगुनाता है
मैंने तो आँखों को अपनी मूंद रखा था
फिर भी सपनो में मेरे चुपके से आता जाता है
प्यार है या वो ख्वाब मालूम नहीं
पर यादो के समंदर में वो प्यार भरे गीत गुनगुनात है
वो आवारा बादल ..वो हवा का एक झोंका
बन के वो खुशबु मेरी सांसो में समां जाता है
नज़र तुम्हारी, नज़र हमारी ने दिल की नज़र है उतारी है लब पे मुस्कान तेरे तो मेरे चेहरे पे ख़ुशी छाई है,
अब मुझको भी होने लगा है जिन्दगी जीने का अहसास,
कभी उदासी कभी ख़ुशी ,कितने रंग दे जाती है ,
ये आरजुएं चंचल तितली बन बन फिर से आती है
ख़्वाबों में बसा ये रिश्ता ,आसमानों को छू जाता है
फिर जब आँखे खुलती है तो ,आँहों में उतर आता है
मै तनहा तनहा बैठी उनको ,बस सोचती रह जाती हूँ ,
ख़्वाबों में बसे ये रिश्ता ,बस ख़्वाबों तक ही रहे जाता है
(कृति............अंजु...(अनु.)

Wednesday, August 18, 2010

प्यार ....वो शब्द है ......ये जो अधूरा होते हुए भी अपने आप मे..पूर्ण है
प्रेम अजेर अमर है ...गंगा जल समान ...प्रेम राधा है ..प्रेम मीरा है ....प्यार वोह प्याला है
जिस ने पिया ...बस उस का रसपान वही जाने !भीड़ मे प्यार है जिस के साथ वोह फिर भी अकेला है ...और अकलेपन में है साथी उसका प्यार...सच्चा प्यार उस मोती समान ..जो सुच्चा है पवित्र है ..........प्यार को परिभाषित नहीं किया जा सकता दोस्तों ......ये अपनेआप मे है पूर्ण ........!प्यार ....शादी से पहले किया जाये या बाद मे इस का अर्थ एक सा है ...प्यार प्यार है...एक एहसास है इस जीवन मे किसी के होने का ..किसी के हो जाने का .....इस मे कोई स्वार्थ नहीं ..कोई द्वेष नहीं ..प्यार देने का नाम है .....अपने उसी साथी को जिसे दिल कि गहरायियो से से चाह तुम ने..........ये जरुरी नहीं कि प्यार शादी से पहले किया जाये या बाद में तो वही सच्चा होगा .....प्यार मे किसी का हो कर देख..मिटा दो अपने को उसी प्यार मे ...डूब जायो आखंड प्यार के सागर मे गोते लगा कर तो देखो .. ..फिर देख....क्या मिलेगा तुझे ....तेरी उम्मीद से जयदा ...प्यार ..प्यार होता है पहले या बाद का नहीं..इसे किसी रिश्ते या नाम की सीमा मे मत बांधो .................प्यार ख़ुशी है ॥प्यार बंधन है ......प्यार जीवन में जीने की वजह है .......प्यार आंसू ......प्यार तड़प है ......इंतज़ार है मीठा सा ........प्यार धोखा है .......मौत है जीवन से नाता तोड़ने के लिए ........उफ़ ये प्यार .............उफ़ ये प्यार

प्यार आजमाइश नहीं विश्वास है खुद के होने का ,
वो बंधन नहीं ,कल्पना कि उडान है ,
एक राह है खुद को खुद से पाने की,
अपने हर सपने को सजाने की ,
पढ़ी जो उसके नैनों में प्यार की भाषा
उसे पूरे होते हुई देखेने की चाह है ....
भूल गयी सारा संसार अब
खुद को भूल ..साथी को पाना है ..
देखा जो उसके चेहरे पे खुद के सम्मान ,
बिन मोल खुद को लुटा देने की चाह है
साथी के झगडे ..और मानाने में भी है ...प्यार ,
उसकी आँखों के प्रणय में भी है ..प्यार ,
और मै क्या कहूँ ............
बस .....प्यार........प्यार और ....प्यार ....!
(......कृति....अंजु .....(अनु.....)

Tuesday, August 17, 2010

बचपन


बचपन के वो दिन जो बहुत अच्छे थे ..जिसकी याद में हर व्यक्ति खुद को जीने लगता है कुछ यादे कभी भुलाये नहीं भूलती ॥बस उन्ही यादो को लिखने की चेष्टा की है


कोई लौटा दे मेरे बचपन के दिन ....
दे मुझे वोह खुला आसमान
जहाँ ना हो टेंशन का आगमन ..
मै भी जी लूँ मस्त बन कर ..
खेलू अपनी गुडियों पटोलो संग ,
वो मिट्टी की ज़मी ..वो रेत का टीला..
वो सावन का झूला मेरा
वो स्कूल का बस्ता...वो किताबो की मस्ती
वो माँ का डांटना और मेरा छिप जाना
फिर प्यार से माँ का पास बिठा के
मुझको खाना खिलाना
यहाँ है सिर्फ खुशियों के डेरा ,
जहाँ न है गृहस्थी का कोई बोझ
ना है अपनों की कोई रोक टोक ..
मै फिर से अपनी गुडिया का
विवाह..गुड्डे से रचा लूँ ..
संग सहेलियों के मै..
फिर से ठहाके लगा लूँ
एक बार फिर से अपने
पितःमाह..को है पाने की इच्छा ..
कोई लौटा दे मुझे ,
मेरे दुलार वाले दिन ..
जिसकी मै थी प्यारी गुडिया ..
काश !कोई मुझे उस से एक बार मिला दे ..
कोई लौटा दे मेरे बचपन के दिन ..............
(......कृति ...अंजु ....(अनु .....)

Friday, August 13, 2010

अंतिम ..सफ़र


मन क्यों अशांत सा है
संतुष्टि का भान क्यों नहीं है
जल रहा दीया
फिर पतंगा ही परेशान सा क्यों है
भागा था वो अँधेरे से डर कर
क्या मिला रोशनी में आ कर

क्यों आँखे सूज रही है
रोते रोते आज
क्यों हो रही है
किरणे मैली सी आज
हम किस को अपनी
कविताये सुनाये
सपनो के ताज महल
अब किसके लिए बनाये

इश्क की राहो में
वो चले नहीं
दिल की पथरीली
ज़मी पे वो ढले नहीं

अब वो एक खिड़की नहीं
जिस में फिर बसर हो
बोलिए हमसे अंतिम
सफ़र कैसे हो ........कैसे हो ?????
कृति ............अंजु (अनु)

Friday, August 6, 2010

मेरे मालिक........


मन क्यों अशांत सा है
संतुष्टि का भान क्यों नहीं है
जल रहा दीया
फिर पतंगा ही परेशान सा क्यों है
भागा था वो अँधेरे से डर कर
पर क्या मिला रोशनी में आ कर उसे

क्यों आँखे सूज रही है
रोते रोते आज
क्यों हो रही है
किरणे मैली सी आज
क्यों शब्दों में है अपमान की भाषा
विचारो कि शुद्दता कहाँ खो सी गई है

आज तो सब वाकया ही बदल गया
क्यों आज अपनी ही बेटियां
एक बाप के लिए बोझ हो गई
क्यों एक मकान घर मे बदल गया
क्यों सारे शहर का मिजाज़ बदल गया
सुना था घर के चिराग से घर जल गया
पर यहाँ तो बड़ो की खुदगर्जी का साया
हम बेटियों पर भी पड़ गया

मेरे मालिक........
तुझ से है इति सी बिनती मेरी
मुझे इंसान बना रहने दो
बनी रहे मेरे दिल में ममता की मूरत
तेरे जहाँ को प्यार कर सकूं
बस इतनी रहमत करना ।

कृति अंजु..(.अनु )

Sunday, July 25, 2010

मोहब्बत..............

तेरे दामन से यू लिपटे है हम कि
ख्याबो के मंज़र भी छोटे नज़र आने लगे हैं ||

दिल की दुनिया को यू सज़ा बैठे है हम तेरे संग कि
भरी महफ़िल में भी खुद को तनहा पाने लगे है हम ||

दुनिया की गुज़रती भीड़ का हिस्सा तो बन गए है हम
पर क्यों ये कदम तुम्हारी तरफ ही बढने लगे हैं ||

नज़र नहीं आता काफिला यारे बहारो का हम को
हम तो अब तेरे साये में ही सिमट कर गुज़र करने लगे हैं ||

आता नहीं है हम को समुद्र की आगोश में छिप के रहना
पर क्या करे तेरे प्यार की गहराई में डूब कर गोते लगाने लगे हैं ||

नहीं मांगी है तुझे से तेरे ख्यालो की दुनिया हम ने
हम तो अपने ही सपनो में तुमसे पनहा मांगने लगे है ||

किया प्यार जो तुमने मुझे खुद से ज्यादा
इजाज़त है ज़िन्दगी से हमको मोहब्बत है तुमसे ||
(((कृति अंजु..((((अनु)))

Sunday, May 16, 2010


नजदीकियां


कैसे है ये दिलो के फांसले , जो नजदीकियां को बढाते हैं ;
जिंदगी के इस मोड़ पर यह प्यार का नाता हमारा ,
रहा कि वीरानियो को जैसे मिल गया हो सहारा तुम्हारा
जिनता दूर होते हैं वो ,उतना ही हमको पास नज़र आते हैं
वो एक प्यार भरा दिल था .जिसे समझने के बाद हम दीवाने हो गए है
वो भी इक प्यार भरी नज़र ही थी ,जिसने मेरे रूप को साकार किया है
ज़िन्दगी के इस मोड़ पर यह प्यार का नाता हमारा ,
राह की वीरानियों को जैसे मिल गया हो सहारा तुम्हारा |
तारो से भरा आसमां ,नहा गया चाँद कि चांदनी से
फूलो से भरी डालियाँ भी ,झुक गयी तुम्हारे सत्कार में
ऐसा खिला है अपना रिश्ता कुछ तुम्हारा कुछ हमारा,
कि तुमको खोजती हूँ, मै चाँद की परछाईयों में ,
बाट तकती हूँ मै तुम्हारी रात की तन्हाइयों में ,
आज मेरी कामनाओं ने तुम्हे कितना है पुकारा,
ऐसी हे कुछ खिला हुआ रिश्ता , कुछ तुम्हारा कुछ हमारा,
ज़िन्दगी के इस मोड़ पर यह प्यार का नाता हमारा ||||
(((कृति ..अंजु चौधरी ..(अनु))))

Thursday, May 13, 2010


मासूम सी अदा

हर शाम चले जाते हो कल का वादा करके
लेकिन तुम बिन कैसे रात गुजार पाएंगे
जाने क्या कहते है वो इन दो निगाहों से
ऐसा लगे जैसे मोहब्बत का पैगाम
सुना कर चले जाते है हमको
मासूम सी अदा ....ख़ामोशी तेरी मुझ से कुछ कहती सी है
आयो साथ चले .....साथ तेरा ...ये एहसास करवाए की तू साथ है मेरे
दूर हो ..पर ऐसा लगे की हर आवाज़ पे ..मेरे ही साथ हो
वफ़ा के सारे वादे निभा गए
आये हो तुम मेरी जिंदगी में
जिंदगी में समां गए हो
हमने जिसको भी छुया..
वो गम दे गया है जिंदगी में
तनहा छोड़ के मुझको
सब चले गए चुपचाप से
जब से हुई है तुम से मुलाकात मेरी
क्यों ऐसा लगे की अब तुम मेरी ही
आरजूयो और दुआयो का नतीजा हो ...........

((......अंजु चौधरी ...(अनु..)

मै जी लूंगी...मै जी लूंगी .......


मै जी लूंगी...मै जी लूंगी .......
अजीब है इस दिल की हसरते भी
पास हो कर भी दूरियाँ हैं कितनी
छुने का मन करता है
पर उसके खो जाने का भी डर
सताता हैं
बैठे है हम पास उनके इतना
मन की आवाज़ को भी वो छू सकते है
जब भी बोलने लगे लब मेरे
वो क्यों धुँया सा हो जाते है ?
एहसास मेरे
शब्दों की भाषा समझते है
सुनता है दिल धडकनों को अगर
वो दर्द की दवा मांगता सा क्यों है?
हमने तो लफ़्ज़ों में उतरा है हर दर्द को
पर तुमने तो दर्द को ही हिस्सों में बाँट दिया है
लो शब्द तुम ले लो
एहसास मुझे देदो
जीत का सहेरा तुम पहनो
अपनी हार का जश्न मै मना लूंगी
खुद में जीने की तमन्ना मै जगा लूंगी
मेरी खुशियाँ आई जो दरवाज़े पर
उस में भी तुम अपनी हिस्सेदारी ले लो
मै खाली पड़े दिल में ही
खुद से जश्न मना लूंगी

मै जी लूंगी.....मै जी लूंगी....
(अंजु ...चौधरी.....(अनु.)

Wednesday, February 24, 2010

मेरी तन्हाई






















(आज मैं अपनी एक पुरानी पोस्ट आप सबके साथ साँझा कर रही हूँ ....इसे मैंने २४ फरवरी २०१० में लिखा था ....शब्दों के बदलाव के बिना और बिना किसी एड्टिंग के आप सबके सामने लाई हूँ )



मेरी तन्हाई में ,
किनते आंसू थे  
कि तुझे से दूर होकर  भी
तेरे पास थी मैं    
चांदनी थी अपने चाँद के साथ  
फिर भी बहुत उदास थी मैं | 

मेरे चाँद को छिपा लिया बादलों ने

जो मेरे मन की 
चांदनी की आखिरी आस था  

सिमट गए मेरे सब सपने
उस अधूरी रात में
अब,टूट गए सब सपने 
तुम्हारे आने की आस में |

क्यों किसी ने ना सुनी 
मेरे बचपन और जवानियाँ
तनहा मैं जी गई
कितनी ही जिन्दगानियाँ
कमज़ोर हूँ..अकेली हूँ ...
फिर भी कि आँखों के बिन रोए 
अश्क सी हूँ    
मै वक़्त का वो भूला बिसरा लम्हा हूँ  
या 
तेरी निगाहों में खटका वो तिनका हूँ  
जो,वो कहते है बोझ मुझे ,
पर,अब मैं तो खुद के ही 
बोझ से भी हल्की हूँ |

ये मन अब किसी रिश्ते में ना बंध पाएगा
फिर भी , 
आज भी है इस दिल में 
हजारों आरजुएँ
जो  कभी नहीं होंगी 
रहनुमाई सी 
भटकन बडी है इस 
प्यार की राहों में
जिस पर अब  मुझे ही चलना है
क्यों 
मेरी तन्हाई में ,इतने आंसू थे ||

 अंजु (अनु)

अजीब सी उलझन में है ये मन


अजीब सी उलझन में है ये मन
अजीब सा ये एहसास है
उम्र के इस मौड़ पर
क्या किसी के आगमन का ये आभास है
क्यों अब ये दिल जोर जोर से धड़कता है
क्यों हर पल उसकी ही सोचो का दायरा है
हर पल ऐसा लगे कि वो मेरे साथ है
क्या उसे भी मेरी तरह इस बात का एहसास है
कि है कोई जो इस दिल के तारो को अब झनझनाता सा है
आ आ कर सपनो में अब वो जगाता सा है
क्यों वो धीरे धीरे मेरे लिए ही गुनगुनाता सा है
अजीब सी उलझन में है ये मन.............
क्यों मै अब नए सपने बुनने लगी हूँ
क्यों इस नयी इस दुनिया में विचरने लगी हूँ
क्यों खुद से ही मै बाते करने लगी हूँ
अरमानो के पंख लगा ...
लो उड़ चला अब मेरा मन
क्यों प्यार के इस नए एहसास से अब मन
डरा डरा सा है
मेरे मन और तन कि भाषा
अब बदली बदली सी है
मेरी आँखों में अब नए सपनो कि दुनिया
अब सजी सजी सी है
है बदलाव का नया नया दौर ये
क्यों मै तरु सी खुद में ही अब
सिमटी सिमटी सी हूँ
अजीब सी उलझन में है ये मन.............
(..कृति..अंजु..(अनु..)

Tuesday, February 23, 2010

खामोशिया


तेरी खामोशिया बहुत कुछ ब्यान करती है
बंदिशे तेरी ..मुझे तक पहुँचती है
देके आवाज़ तुझे ..रोकने का मन करता है
पर क्या करूँ...तेरी भी कुछ मजबूरिया
मुझे हर बार रोकती है ...
बाँध दिए थे सब अरमां…
दूर किसी डाली से..
मेरे चेहरे से तेरे ग़म को जीया आज भी मैंने ,
मिलके जो हमने जलाया वो दोस्ती का दीया आज भी है.....
(...कृति....अंजु...अनु..)

वजह हो तुम .......

वजह हो तुम .......
मन बेचैन है मेरा ...

याद् बन गये हो,
क्यूंकि साथ नहीं हो तुम .......... हृदय में उतर जाते हो ,
मेरी स्पंदन हो तुम .....
मेरे होने की वजह ,
मीठा बंधन हो तुम ......
आँखों में बसते सपने हो तुम
आती हुई हवायो ने
कर दिया बेताब दरिया कि तरह
कली सी मुस्कान सजती रहे
तुम्हारे होंठो पे ,
जब ढूंढती हूँ कण - कण में ,
सब में व्याप्त हो तुम ,
कैसे भूलूँ तुम्हे पल भर को भी ,
मुझमे शुरू , मुझमे समाप्त हो तुम ..
(......कृति ...अंजु..अनु ..)

प्यार हमारा


प्यार हमारा
जिसका कोई रूप नहीं है जिसकी कोई भाषा ,कोई बोली नहीं है जो समझता है दिल कि ही बातो को एहसास है तो सिर्फ साथ बंध जाने का तमन्ना है तो अब साथ निभाने की हम तो एक पत्थर है उस रस्ते के जिस से महोब्बत के महल बना करते है मुझे ऐसी अदा से नवाज़ा एह खुदा मेरे महोब्बत का जनुन जब दिल में बसता है तो इस दिल में एक अजीब सा तुफ्फान सा उठता है इतने से काफी हो जाये ये सबब ..एह खुदा कि इश्क कि तनहा साँसे भी मुझे महका देती है उनकी यादे के साये जब घेर के मंडराते है तो चिराग महोब्बत के ही उनके मेरे इर्द गिर्द मंडराते है प्यार हमारा

जिसका कोई रूप नहीं है
.......... (..कृति ..अंजु...अनु...)